विते वर्ष को देख के कहा जा सकता है की ऐसा वर्ष एक जनतांत्रिक देश के विकास के सपनो को दुह्स्वपन में परिवर्तित करने वाला वर्ष हो सकता है, सभी आकडे बताते है की भारत तमाम परेशानी और बाधा के होते हुवे भी आगे बढ़ने की हर पुरजोर कोसिस कर रहा है. भारत के हर क्षेत्र में बहुत सारे संभावना एवं खामिया भरी हुवी है,ये लोगो पर पूरी तरह निर्भर है की वो उस उपलब्धि का किस तरह उपयोग करते है या करने देते है, वर्तमान यूपीए सरकार का यह प्रधानमंत्री एवं अर्थशास्त्री डा. मनमोहन के नेतृत्व में लगातार दूसरा कार्यकाल है, परन्तु पिछले वर्षों के परिणाम हर वोटर को ये सोचने को मजबूर कर दिया है, की क्या यही दिन देखने को हमने इस सरकार को लगातार दूसरी बार सर-आँखों पर बैठाया था. एक पुनः निर्वाचित सरकार से ये अपेक्षा की जाती है की वो अपने द्वारा प्रारंभ किये विभिन्न परोपकारी-लाभकारी योजनाओं (जिन्हें लोगो ने पसंद किया है) उसे और तत्परता से लागु करे एवं विकास की गति को दुगनी रत्फ्तर से आगे ले जाये, पर यूपीए के घटक दलों ने पूरी तरह से यह निश्चित करने को उतारू है की उनकी संसद के माध्यम से सेवा से मन भर गया है और वे अपना भविष्य महाघोटाले कर सुनिश्चित करने पर आतुर है. सभी विभागों में लगातार असंविधानिक तरीके से मनमाना कम किया जा रहा है, सभी मंत्री सर ये मान कर चलने लगे है की देश का प्रधानमंत्री अगर ईमानदार है तो पूरी सरकार को इमानदार मन जायेगा, वो चाहे कुछ भी गलत कर वो एक ईमानदार नेतृत्व के अंदर किसी को नजर नहीं आएगा.
सबसे पहले इन माननीयो की मनसा इनके द्वारा राष्ट्रमंडल खेलो के आयोजन के नाम पर की गयी अनुमानत लगत से कई गुना खर्च की गयी राशि, एवं इस खेल की सफलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है की आयोजन कमिटी कई गुना खर्चा करने के बाद भी अनुमानित कमाई का सिर्फ २० प्रतिशत ही कमा सकी, इसके बाद भी सरकार का दावा है की यह अंतरास्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता का सफलता पूर्वक आयोजन किया गया है और इससे भारत की नयी पहचान बनी है, जी सरकार आपने इस देश का नया चेरा पुरे विश्व के सामने रख दिया जो की यह बताता है की राष्ट्रीय महत्व के आयोजनों में भी हमारी सरकार और प्रशासन हेर-फेर करने से नहीं चुकते है,
इसके बाद पिछले कुछ वर्षों से संदेह के घेरे में घिरने वाला सेना सेवा का भी प्रशासन के साथ मिलीभगत करते हुवे पकड़ा जाना पुरे देश को अचंभित कर दिया है , कुछ समय से गलत तरीके से मेडल प्राप्त करने के एवं गलत सौर्य गाथा का बखान करने का आरोप भी सेना के कुछ अदिकारियो पर लगा. अभीतक भ्रस्टाचार से दूर अवम देश भक्ति से ओत-प्रोत सेना की चावी एक निस्वार्थ भावना से देश की सेवा करने वाले सैनिको पर इस तरह के इल्जाम कभी भी नहीं लगे, परन्तु लगातार अनदेखी एवं सरकारी उपेक्छा ने ही निस्संदेह रूप से इस तरह के कदम का दोषी कहा जा सकता है.
फिर आया टेलिकॉम मामले में पाई गयी अनियमितताएँ, इस संधर्भ में कहा जाता है की सम्बंधित दूरसंचार विभाग के मंत्री द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय के सुझावों को भी अनदेखा करते हुवे मनमानी की, और सरकारी खाते को बहुत भारी नुकसान उठाना पडा, साथ साथ ये भी कहा जा रहा है की वर्तमान सरकार के मंत्री प्रधानमंत्रि जी के सुझावों पर ध्यान नहीं देते है ये जानते हुवे भी प्रधानमंत्री कोई पुख्ता कदम नहीं उठाये और इनको अपनी मनमानी करने की पूरी छुट दे डाली.
इसके बाद अभी अभी सुर्खियों में आया एस बेंड घोटाला जो की सीधे प्रधानमंत्री के अंतर्गत आता है वह भी कुछ विशेष लोगो द्वारा दबाव बना कर उसकी खरीद में एक कंपनी को विशेष राहत दिलवाई गयी है.
महंगाई इस सरकार का साथ नहीं छोड़ रही या कहे तो इस सरकार की पसंदीदा कार्यक्रम या उपक्रम है ज्पहले सरकार है जिसका क्रिकेट मंत्री माफ़ कीजियेगा कृषि मंत्री खुले आम कहता है की महंगाई से उसका कोई लेना देना नहीं है ये सब के कारण प्रधानमंत्री एवं उनकी योजनाये है, वे इस मामले में कुछ नहीं कर सकते और महंगाई कम करना या उसके लिए कोसिस करना उनका काम नहीं है, जी सरकार आपने तो देश को वर्ल्ड कप दिलाने का ठीका लिया हुवा है पर प्रधानमंत्री ने कृषि विभाग जबरदस्ती आपके पल्ले डाल दिया है, इस देश में कृषि उत्पादन बढ़ाने का जिम्मा आपने नहीं लिया है और गोदामो में सड़ते अनाज को आप विपन्न परिवारों को मुफ्त में उपलब्ध भी नहीं करना चाहते है, तो क्या आप ये कहते है की पूरा देश बस टेलीविजन के आगे बैठ क्रिकेट देखे और कुछ खाने पिने को नहीं मांगे जैसा की स्टेडियम में गए दर्शको के साथ होता है. तो इस तरह देश कैसे चले.
पहली बार किसी सरकार ने आतंकवाद को धार्मिक नजरिये से खुद देख कर सुसरो से इसे इस पैमाने पर न देखने को कह रही है, गृहमंत्री बार-बार जांच एजेंसियों को किसी हिंदू आतंक से सजग रहने को कटे है और मीडिया इस पुरे मीटिंग का एक एक बिंदु पर विचार कर उसे भी और आतंक की चासनी में मिला के पुरे देश में घरों में पहुचा रहा है जाने अनजाने में भय और आतंक का माहौल पैदा किया जा रहा है, इससे लोगो के बिच तनाव पैदा होता है और सरकार की मनसा साफ़ हो जाती है की सरकार देश का ध्यान बुनियादी मुद्दों से हटा के धर्म और आस्था के प्रतीकों की तरफ घुमा कर भ्रमित करने की कोसिस कर रही है
यह एक ऐसा समय है जब हर सांसद और विधायक अपने क्षेत्र के विकास के बदले बस अपने भविष्य की योज्नावो के गुम है, सांसदों की ५० फीसीदी वेतन वृद्धि की सिफारिस यही साबित करती है की जब बढते महंगाई से आम आदमी की कमर टूट रही है तब बस आपने वेतन की चिंता करना और देश को उसके हाल पर छोड़ देना की आज के नेता सिर्फ अपने भविष्य को लेकर चिंतित है. वो दिन गए जब अनाज की कमी के कारण देश के प्रधानमंत्री ने सप्ताह में एक दिन का भोजन त्याग दिया था और पुरे देश से भी इस तरह भोजन को बचने की प्रार्थना की थी. बेहतेर होता की ये सरकार खुद के द्वारा उठाये गए कदमो का सही आंकलन करे और देश को सही रास्ते पर ले कर चले.
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