Tuesday, September 7, 2010

भारत एवं किसान



भारत एवं किसान

      यदि आप भारत की बात कर रहे है तो आपके मन में स्वतः स्फूर्त लहलहाते खेत, हरियाली भरा वातावरण, स्वस्थ व मुस्कुराते चहरे, बैलों की मदद से खेती करता किसान, स्वच्छ वायु साफ़ पर्यावरण, फल-फूलो से लदे पेड- पौधो के चित्र आपके आँखों के सामने आ जायेंगे. भारत किसानो का देश है, कृषक प्रधान देश है, गावो का देश है . यही इसकी आसली पहचान है. बिना गांव, खेती और किसान के भारत, भारत नहीं इण्डिया है. कृषि  भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण क्षेत्र है. इससे देश की कुल कार्यशील जनसँख्या के ६० प्रतिशत  एवं कुल ग्रामीण कार्यशील जनता का ८० % लोगो को प्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त होता है. अतः प्रारंभ से ही देश की जी. डी. पि. में इसका महत्व है. परन्तु देश की जी. डी. पि. में कृषि का योगदान ५९ % से घटते हुवे आज १८% हो गयी है.विश्व में उदारीकरण के प्रारंभ होने से भारतीय कृषि पर इसका असर बुरा पड़ा, इससे भारत और इण्डिया की दूरिया बढ़ने लगी. बीते दशको से भारत के शोषण एवम इण्डिया के पोषण की प्रक्रियाए बढती ही जा रही है. इसका दुष्परिणाम हर वर्ष घटती पैदावार, कम होती कृषि भूमि, बदहाल होते गांव, किसानो का महानगरों की तरफ पलायन, किसानो की बढती आत्महत्या, खत्म होते खेत और बढते शहर. अगर आने वाले वर्षों में यही स्थिति बरक़रार रहती है तो इससे भारत और इन्डिया के बिच कअ अंतर और बढ़ जायेगा और दोनों के बीच संघर्ष पैदा हो जायेगा. देश के सन्तुलित विकास के लिए ये इस असन्तुलन को समाप्त करने की आवश्यकता है.
       आज किसानो की बात हर जगह होती है, उनके लिए विभिन्न योजनाओ एवं सुविधाए लागु कीये जाते है, इनके बारे में खेतों के काम करता किसान कुछ जानता तक नहीं, तथा विभिन्न अनुदानों से नेता-किसान, व्यापारी , पूंजीपति और नौकरशाहों को लाभ होता रहता है,अगर इसी रास्ते पर देश चलता रहा तो कृषि पर आधारित जीवन वाली दो तिहाई जनसंख्या का क्या होगा. भारत की कृषि और किसान बहुत से समस्याओं से ग्रस्त-त्रस्त है.इनमे पमुख है, दोषपूर्ण भुसुधार प्रणाली, कमजोर व अनुपयुक्त सिंचाई व्यवस्था, वित्त की कमी, प्रकृति के अनुसार बिज की कमी, विदेशी या देशी रासायनि खादों एवं बिजो की धोखेबाजी, मौसम पर निर्भरता, उचित भण्डारण का अभाव, उपज के पश्चात उपज का सही मूल्य न मिल पाना, देशी बीज, खाद, कीटनाशक पर न के बराबर शोध, विपणन की दोषपूर्ण और अपर्याप्त व्यवस्था एवं नयी योजनाओं के क्रियान्वन में सरकारी उपेक्षा.

      आजकल भारत की कृषि के विकास के लिए विदेशी तकनीक का अंधाधुंन आयात किया जा रहा है, हमने कपास के मामले कम विदेशी बिजो का हाल देखा है. आज उच्च उत्पादकता वाले बीजों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशक दवाओं पर आधारित नयी कृषि तकनीक को बिना सोचे समझे अपना लेने का दुष्परिणाम हम भुगतने को मजबूर हो गए है, इससे देशी बीज प्रायः समाप्त हो गए है. भूजलस्तर निचे चल गया है, रासायनिक उत्पादों का प्रयोग करने के कारन प्रदुषण एवं स्वाथ्य सम्बन्धी समस्याएं बढ़ गयी है.

      कृषि जो की गरीबी को उद्योग के मुकाबले दोगुनी तेजी से कम कर सकता है, वही आज गिरावट झेल रहा है. वर्ष २००९-१०  में कृषि में ०.२% और उससे पहले के वर्ष में १.६% की गिरावट देखि गयी है, २००५-२००८ के बिच इसमें बढ़ोतरी दर्ज की गयी थी पर इसमें सरकार से ज्यादा मौसम की भागीदारी है. इस वर्ष मौनसून ने लुकाछुपी खेलते हुवे किसानो के भाग्य और सरकार की नीतियों पर करार तमाचा जाडा है. पिछले कुछ वर्षों से पंजाब का अनाज उत्पादन में कमी आई है, वे १० वर्षों पुराने बीज एवं तकनीकों का लगातार  इस्तेमाल करत आये है और किसान अनाज के उत्पादन को चोद कर नकदी फसलों के उत्पादन में आकर्षित हो रहे है. वैज्ञनिको द्वारा प्रस्तावित बीज एवम बाजार में उपलब्ध बीज एवं खादों के बहुत अंतर होता है. कुछ वर्षों से बिहार, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और गुजरात ने उत्पादन में बढ़ोतरी की है पर वो बहोत किले तारीफ नहीं है.
     
      ये सभी बातें तो उत्पादन से पहले की बात है, पर भारतीय किसान अच्छा उत्पादन कर के भी ठगा जाता है, इसी वर्ष जनवरी-फरवरी में आलू-प्याज की कीमते आसमान छु रही थी, देश में हाहाकार मच रहा था सरकार द्वारा किसानो को इनकी खेती  को प्रोत्साहित किया गया, और बिभिन्न शुविधाये भी उपलब्ध कराई गयी, इस बार इनकी पैदावार दुगुनी हो कर १००० करोड टन हो गयी है, अब किसानो के सामने अपनी खर्च की गयी धनराशी को भी प्राप्त करना मुश्किल हो गया है, सभी गोदाम ठसाठस भरे जा चुके है और पैदा हुवे फसल को उपयोग करने को कोई साधन उपलब्ध नहीं है, मौजुदा हालत में किसान को फसल को खेत से बाजार तक ले जाने का भी खर्च नहीं मिल पा रहा है तो वे इसके लिए उठाये गए ऋण की भरपायी कैसे करेंगे का भवर सामने दिख रहा है, जब जब किसान का रुझान नकदी फसलों की तरफ होता है वो ठगा जाता है, इस वर्ष उत्तर-भारत में आलू की पैदावार अच्छी हुई है इसी के साथ किसानो के लिए समस्या भी पैदा हो गयी है. इस फसल को खेतों में सडने को छोड़ने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बच जाता पर उनके द्वारा किये गए परिश्रम को मोल कौन देगा, कम से कम उसके पसीने की कीमत तो उसे मिलनी ही चाहिए.
      इसी तरह दो-तीन वर्षों के अंतराल पर कर्णाटक के किसान अपने प्रसिद्ध हरी-मिर्च की ज्यादा उपज को सडको के किनारे फेक कर अपने शोक और छोभ को व्यक्त करते है.
      नकदी फसलों के बढ़ावा से अन्य समस्याए खड़ी हो जाती है, देश का घटता अनाज का उत्पादन देश के लिए गंभीर समस्या है, भारत में खाधान की प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति उपलब्ध मात्रा १९५१ में ३९५ ग्रा. थी जो २००८ में ४३६ ग्रा. तक ही पहुच सकी है, इसमें दाल का अंश ६१ ग्रा. से घट कर ४२ ग्रा. हो गयी है, इसी प्रकार अन्य आवश्यक वास्तुवो की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता घट गयी है, यह तो पुरे देश का औसत है जिसमे गरीब के हिस्से तो बहुत ही कम आता है,इन सभी बातो पर गंभीरता से विचार करने की आवस्यकता है,
क्योंकि हम नयी तकनीक और ऐशो आराम की चीजे तो विदेशो से आयात कर सकते है पर १०० करोड की जनसँख्या को आयात कर भोजन उपलब्ध नहीं करा सकते.

जय हिंद


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