Tuesday, February 15, 2011

घोटालों की सुनामी


विते वर्ष को देख के कहा जा सकता है की ऐसा वर्ष एक जनतांत्रिक देश के विकास के सपनो को दुह्स्वपन में परिवर्तित करने वाला वर्ष हो सकता है, सभी आकडे बताते है की भारत तमाम परेशानी और बाधा के होते हुवे भी आगे बढ़ने की हर पुरजोर कोसिस कर रहा है. भारत के हर क्षेत्र में बहुत सारे संभावना एवं खामिया भरी हुवी है,ये लोगो पर पूरी तरह निर्भर है की वो उस उपलब्धि का किस तरह उपयोग करते है या करने देते है, वर्तमान यूपीए सरकार का यह प्रधानमंत्री एवं अर्थशास्त्री डा. मनमोहन के नेतृत्व में लगातार दूसरा कार्यकाल है, परन्तु पिछले वर्षों के परिणाम हर वोटर को ये सोचने को मजबूर कर दिया है, की क्या यही दिन देखने को हमने इस सरकार को लगातार दूसरी बार सर-आँखों पर बैठाया था. एक पुनः निर्वाचित सरकार से ये अपेक्षा की जाती है की वो अपने द्वारा प्रारंभ किये विभिन्न परोपकारी-लाभकारी योजनाओं (जिन्हें लोगो ने पसंद किया है) उसे और तत्परता से लागु करे एवं विकास की गति को दुगनी रत्फ्तर से आगे ले जाये, पर यूपीए के घटक दलों ने पूरी तरह से यह निश्चित करने को उतारू है की उनकी संसद के माध्यम से सेवा से मन भर गया है और वे अपना भविष्य महाघोटाले कर सुनिश्चित करने पर आतुर है. सभी विभागों में लगातार असंविधानिक तरीके से मनमाना कम किया जा रहा है, सभी मंत्री सर ये मान कर चलने लगे है की देश का प्रधानमंत्री अगर ईमानदार है तो पूरी सरकार को इमानदार मन जायेगा, वो चाहे कुछ भी गलत कर वो एक ईमानदार नेतृत्व के अंदर किसी को नजर नहीं आएगा.
सबसे पहले इन माननीयो की मनसा इनके द्वारा राष्ट्रमंडल खेलो के आयोजन के नाम पर की गयी अनुमानत लगत से कई गुना खर्च की गयी राशि, एवं इस खेल की सफलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है की आयोजन कमिटी कई गुना खर्चा करने के बाद भी अनुमानित कमाई का सिर्फ २० प्रतिशत ही कमा सकी, इसके बाद भी सरकार का दावा है की यह अंतरास्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता का सफलता पूर्वक आयोजन किया गया है और इससे भारत की नयी पहचान बनी है, जी सरकार आपने इस देश का नया चेरा पुरे विश्व के सामने रख दिया जो की यह बताता है की राष्ट्रीय महत्व के आयोजनों में भी हमारी सरकार और प्रशासन हेर-फेर करने से नहीं चुकते है,
इसके बाद पिछले कुछ वर्षों से संदेह के घेरे में घिरने वाला सेना सेवा का भी प्रशासन के साथ मिलीभगत करते हुवे पकड़ा जाना पुरे देश को अचंभित कर दिया है , कुछ समय से गलत तरीके से मेडल प्राप्त करने के एवं गलत सौर्य गाथा का बखान करने का आरोप भी सेना के कुछ अदिकारियो पर लगा. अभीतक भ्रस्टाचार से दूर अवम देश भक्ति से ओत-प्रोत सेना की चावी एक निस्वार्थ भावना से देश की सेवा करने वाले सैनिको पर इस तरह के इल्जाम कभी भी नहीं लगे, परन्तु लगातार अनदेखी एवं सरकारी उपेक्छा ने ही निस्संदेह रूप से इस तरह के कदम का दोषी कहा जा सकता है.
फिर आया टेलिकॉम मामले में पाई गयी अनियमितताएँ, इस संधर्भ में कहा जाता है की सम्बंधित दूरसंचार विभाग के मंत्री द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय के सुझावों को भी अनदेखा करते हुवे मनमानी की, और सरकारी खाते को बहुत भारी नुकसान उठाना पडा, साथ साथ ये भी कहा जा रहा है की वर्तमान सरकार के मंत्री प्रधानमंत्रि जी के सुझावों पर ध्यान नहीं देते है ये जानते हुवे भी प्रधानमंत्री कोई पुख्ता कदम नहीं उठाये और इनको अपनी मनमानी करने की पूरी छुट दे डाली.
इसके बाद अभी अभी सुर्खियों में आया एस बेंड घोटाला जो की सीधे प्रधानमंत्री के अंतर्गत आता है वह भी कुछ विशेष लोगो द्वारा दबाव बना कर उसकी खरीद में एक कंपनी को विशेष राहत दिलवाई गयी है.
महंगाई इस सरकार का साथ नहीं छोड़ रही या कहे तो इस सरकार की पसंदीदा कार्यक्रम या उपक्रम है ज्पहले सरकार है जिसका क्रिकेट मंत्री माफ़ कीजियेगा कृषि मंत्री खुले आम कहता है की महंगाई से उसका कोई लेना देना नहीं है ये सब के कारण प्रधानमंत्री एवं उनकी योजनाये है, वे इस मामले में कुछ नहीं कर सकते और महंगाई कम करना या उसके लिए कोसिस करना उनका काम नहीं है, जी सरकार आपने तो देश को वर्ल्ड कप दिलाने का ठीका लिया हुवा है पर प्रधानमंत्री ने कृषि विभाग जबरदस्ती आपके पल्ले डाल दिया है, इस देश में कृषि उत्पादन बढ़ाने का जिम्मा आपने नहीं लिया है और गोदामो में सड़ते अनाज को आप विपन्न परिवारों को मुफ्त में उपलब्ध भी नहीं करना चाहते है, तो क्या आप ये कहते है की पूरा देश बस टेलीविजन के आगे बैठ क्रिकेट देखे और कुछ खाने पिने को नहीं मांगे जैसा की स्टेडियम में गए दर्शको के साथ होता है. तो इस तरह देश कैसे चले.
पहली बार किसी सरकार ने आतंकवाद को धार्मिक नजरिये से खुद देख कर सुसरो से इसे इस पैमाने पर न देखने को कह रही है, गृहमंत्री बार-बार जांच एजेंसियों को किसी हिंदू आतंक से सजग रहने को कटे है और मीडिया इस पुरे मीटिंग का एक एक बिंदु पर विचार कर उसे भी और आतंक की चासनी में मिला के पुरे देश में घरों में पहुचा रहा है जाने अनजाने में भय और आतंक का माहौल पैदा किया जा रहा है, इससे लोगो के बिच तनाव पैदा होता है और सरकार की मनसा साफ़ हो जाती है की सरकार देश का ध्यान बुनियादी मुद्दों से हटा के धर्म और आस्था के प्रतीकों की तरफ घुमा कर भ्रमित करने की कोसिस कर रही है
यह एक ऐसा समय है जब हर सांसद और  विधायक अपने क्षेत्र के विकास के बदले बस अपने भविष्य की योज्नावो के गुम है, सांसदों की ५० फीसीदी वेतन वृद्धि की सिफारिस यही साबित करती है की जब बढते महंगाई से आम आदमी की कमर टूट रही है तब बस आपने वेतन की चिंता करना और देश को उसके हाल पर  छोड़ देना की आज के नेता सिर्फ अपने भविष्य को लेकर चिंतित है. वो दिन गए जब अनाज की कमी के कारण देश के प्रधानमंत्री ने सप्ताह में एक दिन का भोजन त्याग दिया था और पुरे देश से भी इस तरह भोजन को बचने की प्रार्थना की थी. बेहतेर होता की ये सरकार खुद के द्वारा उठाये गए कदमो का सही आंकलन करे और देश को सही रास्ते पर ले कर चले.

Tuesday, September 7, 2010

भारत एवं किसान



भारत एवं किसान

      यदि आप भारत की बात कर रहे है तो आपके मन में स्वतः स्फूर्त लहलहाते खेत, हरियाली भरा वातावरण, स्वस्थ व मुस्कुराते चहरे, बैलों की मदद से खेती करता किसान, स्वच्छ वायु साफ़ पर्यावरण, फल-फूलो से लदे पेड- पौधो के चित्र आपके आँखों के सामने आ जायेंगे. भारत किसानो का देश है, कृषक प्रधान देश है, गावो का देश है . यही इसकी आसली पहचान है. बिना गांव, खेती और किसान के भारत, भारत नहीं इण्डिया है. कृषि  भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण क्षेत्र है. इससे देश की कुल कार्यशील जनसँख्या के ६० प्रतिशत  एवं कुल ग्रामीण कार्यशील जनता का ८० % लोगो को प्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त होता है. अतः प्रारंभ से ही देश की जी. डी. पि. में इसका महत्व है. परन्तु देश की जी. डी. पि. में कृषि का योगदान ५९ % से घटते हुवे आज १८% हो गयी है.विश्व में उदारीकरण के प्रारंभ होने से भारतीय कृषि पर इसका असर बुरा पड़ा, इससे भारत और इण्डिया की दूरिया बढ़ने लगी. बीते दशको से भारत के शोषण एवम इण्डिया के पोषण की प्रक्रियाए बढती ही जा रही है. इसका दुष्परिणाम हर वर्ष घटती पैदावार, कम होती कृषि भूमि, बदहाल होते गांव, किसानो का महानगरों की तरफ पलायन, किसानो की बढती आत्महत्या, खत्म होते खेत और बढते शहर. अगर आने वाले वर्षों में यही स्थिति बरक़रार रहती है तो इससे भारत और इन्डिया के बिच कअ अंतर और बढ़ जायेगा और दोनों के बीच संघर्ष पैदा हो जायेगा. देश के सन्तुलित विकास के लिए ये इस असन्तुलन को समाप्त करने की आवश्यकता है.
       आज किसानो की बात हर जगह होती है, उनके लिए विभिन्न योजनाओ एवं सुविधाए लागु कीये जाते है, इनके बारे में खेतों के काम करता किसान कुछ जानता तक नहीं, तथा विभिन्न अनुदानों से नेता-किसान, व्यापारी , पूंजीपति और नौकरशाहों को लाभ होता रहता है,अगर इसी रास्ते पर देश चलता रहा तो कृषि पर आधारित जीवन वाली दो तिहाई जनसंख्या का क्या होगा. भारत की कृषि और किसान बहुत से समस्याओं से ग्रस्त-त्रस्त है.इनमे पमुख है, दोषपूर्ण भुसुधार प्रणाली, कमजोर व अनुपयुक्त सिंचाई व्यवस्था, वित्त की कमी, प्रकृति के अनुसार बिज की कमी, विदेशी या देशी रासायनि खादों एवं बिजो की धोखेबाजी, मौसम पर निर्भरता, उचित भण्डारण का अभाव, उपज के पश्चात उपज का सही मूल्य न मिल पाना, देशी बीज, खाद, कीटनाशक पर न के बराबर शोध, विपणन की दोषपूर्ण और अपर्याप्त व्यवस्था एवं नयी योजनाओं के क्रियान्वन में सरकारी उपेक्षा.

      आजकल भारत की कृषि के विकास के लिए विदेशी तकनीक का अंधाधुंन आयात किया जा रहा है, हमने कपास के मामले कम विदेशी बिजो का हाल देखा है. आज उच्च उत्पादकता वाले बीजों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशक दवाओं पर आधारित नयी कृषि तकनीक को बिना सोचे समझे अपना लेने का दुष्परिणाम हम भुगतने को मजबूर हो गए है, इससे देशी बीज प्रायः समाप्त हो गए है. भूजलस्तर निचे चल गया है, रासायनिक उत्पादों का प्रयोग करने के कारन प्रदुषण एवं स्वाथ्य सम्बन्धी समस्याएं बढ़ गयी है.

      कृषि जो की गरीबी को उद्योग के मुकाबले दोगुनी तेजी से कम कर सकता है, वही आज गिरावट झेल रहा है. वर्ष २००९-१०  में कृषि में ०.२% और उससे पहले के वर्ष में १.६% की गिरावट देखि गयी है, २००५-२००८ के बिच इसमें बढ़ोतरी दर्ज की गयी थी पर इसमें सरकार से ज्यादा मौसम की भागीदारी है. इस वर्ष मौनसून ने लुकाछुपी खेलते हुवे किसानो के भाग्य और सरकार की नीतियों पर करार तमाचा जाडा है. पिछले कुछ वर्षों से पंजाब का अनाज उत्पादन में कमी आई है, वे १० वर्षों पुराने बीज एवं तकनीकों का लगातार  इस्तेमाल करत आये है और किसान अनाज के उत्पादन को चोद कर नकदी फसलों के उत्पादन में आकर्षित हो रहे है. वैज्ञनिको द्वारा प्रस्तावित बीज एवम बाजार में उपलब्ध बीज एवं खादों के बहुत अंतर होता है. कुछ वर्षों से बिहार, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और गुजरात ने उत्पादन में बढ़ोतरी की है पर वो बहोत किले तारीफ नहीं है.
     
      ये सभी बातें तो उत्पादन से पहले की बात है, पर भारतीय किसान अच्छा उत्पादन कर के भी ठगा जाता है, इसी वर्ष जनवरी-फरवरी में आलू-प्याज की कीमते आसमान छु रही थी, देश में हाहाकार मच रहा था सरकार द्वारा किसानो को इनकी खेती  को प्रोत्साहित किया गया, और बिभिन्न शुविधाये भी उपलब्ध कराई गयी, इस बार इनकी पैदावार दुगुनी हो कर १००० करोड टन हो गयी है, अब किसानो के सामने अपनी खर्च की गयी धनराशी को भी प्राप्त करना मुश्किल हो गया है, सभी गोदाम ठसाठस भरे जा चुके है और पैदा हुवे फसल को उपयोग करने को कोई साधन उपलब्ध नहीं है, मौजुदा हालत में किसान को फसल को खेत से बाजार तक ले जाने का भी खर्च नहीं मिल पा रहा है तो वे इसके लिए उठाये गए ऋण की भरपायी कैसे करेंगे का भवर सामने दिख रहा है, जब जब किसान का रुझान नकदी फसलों की तरफ होता है वो ठगा जाता है, इस वर्ष उत्तर-भारत में आलू की पैदावार अच्छी हुई है इसी के साथ किसानो के लिए समस्या भी पैदा हो गयी है. इस फसल को खेतों में सडने को छोड़ने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बच जाता पर उनके द्वारा किये गए परिश्रम को मोल कौन देगा, कम से कम उसके पसीने की कीमत तो उसे मिलनी ही चाहिए.
      इसी तरह दो-तीन वर्षों के अंतराल पर कर्णाटक के किसान अपने प्रसिद्ध हरी-मिर्च की ज्यादा उपज को सडको के किनारे फेक कर अपने शोक और छोभ को व्यक्त करते है.
      नकदी फसलों के बढ़ावा से अन्य समस्याए खड़ी हो जाती है, देश का घटता अनाज का उत्पादन देश के लिए गंभीर समस्या है, भारत में खाधान की प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति उपलब्ध मात्रा १९५१ में ३९५ ग्रा. थी जो २००८ में ४३६ ग्रा. तक ही पहुच सकी है, इसमें दाल का अंश ६१ ग्रा. से घट कर ४२ ग्रा. हो गयी है, इसी प्रकार अन्य आवश्यक वास्तुवो की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता घट गयी है, यह तो पुरे देश का औसत है जिसमे गरीब के हिस्से तो बहुत ही कम आता है,इन सभी बातो पर गंभीरता से विचार करने की आवस्यकता है,
क्योंकि हम नयी तकनीक और ऐशो आराम की चीजे तो विदेशो से आयात कर सकते है पर १०० करोड की जनसँख्या को आयात कर भोजन उपलब्ध नहीं करा सकते.

जय हिंद